ABHARAK BHASMA-500 PUTI (अभ्रक भस्म)

शुद्ध धान्याभ्रक

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भावना द्रव्य

आक का दुग्ध, थूअर का दुग्ध, बड़ जटा, घृतकुमारीस्वरस, एरण्ड के पत्तों का रस, नागरमोथा क्वाथ, गिलोयस्वरस, छोटी कटेली का क्वाथ, कड़ी कटेली का क्वाथ,गौखरू क्वाथ, भांग का क्वाथ, कुकुरोंधा का स्वरस,सहदेवी का रस, नागबला का क्वाथ, अतिबला क्वाथ,खिरैठी का क्वाथ, तुलसी स्वरस, शालपर्णी का क्वाथ,पृष्पपर्णी क्वाथ, कसौंदी पत्तों का स्वरस, अरणी छालक्वाथ, बेल के पत्तों का क्वाथ, देवदारु क्वाथ, काली मिर्चक्वाथ, अदरक स्वरस, पीपल क्वाथ, चित्रकमूल क्वाथ,इन्द्रायण जड़ क्वाथ, लोध्र क्वाथ, कुटकी क्वाथ, जामुनकी छाल क्वाथ, आंवले स्वरस, हरड़ क्वाथ, बहेड़ाक्वाथ, अडूसा स्वरस, तेन्दू की छालक्वाथ, अपामार्गक्वाथ, मोलसरी की छाल का क्वाथ, भांगरे का स्वरस, गौदुग्ध, अगस्तय के पत्तों का रस, बड़ी तोरई का रस, गौमूत्र,पाढ़ल का क्वाथ, तालीस पत्र क्वाथ, केले के खम्बे कारस, मूसली क्वाथ, अश्वगंधा क्वाथ, दूर्वा का क्वाथ,देवदाली पंचांग क्वाथ, मत्स्याक्षी रस, मकोय रस, पुनर्नवाक्वाथ, शंखपुष्पी का रस, नागर बेल के पत्तों का रस, खैरछाल का क्वाथ, ब्राह्मी का रस, जटामांसी का क्वाथ,धमासे का क्वाथ, अमलतास की फली का क्वाथ,आकाश बेल क्वाथ, चमेली के पत्तें का स्वरस, भारंगीक्वाथ, शतावरी का रस, विदारीकन्द का रस।निश्चन्द्रीकरण हेतु कल्मीशोरा व गुड़।

उपयोग

निर्बलता, श्वास, कास, हृदयरोग, धातु क्षीणता, राजयक्ष्मा,पित्त प्रभाव रोग, जीर्ण यकृत शोथ, पाण्डु, कामला,संग्रहणी, उन्‍्माद, अपस्मार, प्रमेह, कुष्ठ आदि रोगों में लाभप्रद है।

मात्रा 125 मि.ग्रा. से 250 मि.ग्रा. दिन में 2 बार।
 अनुपान  शहद

 

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