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आयुर्वेद क्या है ?

 

आयु + वेद। आयु का अर्थ है जीवन और वेद का अर्थ है विज्ञान, इस प्रकार आयुर्वेद को जीवन का विज्ञान भी कहा जाता है। हमारे जीवन का प्रारम्भ शरीर, इन्द्रिय, मन और आत्मा का संयोग होने पर होता है। इस प्रकार जीवन

का प्रारम्भ माता के गर्भ में ही हो जाता है। शरीर: यहपृथ्वी,जल, तेज, वायु और आकाश के संयोग से बनता है परन्तु जड़ है, चेतन नहीं।

इन्द्रिय :  पाँचस्त्रोत (कर्मेन्द्रियाँ) व त्वचा, रसना, नेत्र, प्राण व कर्ण यह भी पॉँचों महाभूतों से ही सम्बद्ध छ॒ है। साथ ही जड़ भी हैं। मन: यहएकहोताहै और यह भी जड़ है। आत्मा : चेतन है।शरीर में बैठा हुआ साक्षी रूप है।

इस प्रकार हमारा जीवन जड़ और चेतन के संयोजन का परिणाम है। यह जीवन हिंतकर भी हो सकता है, अहितकर भी, सुखमय और दुः:खमय भी हो सकता है।

इस जीवन के हितकर और अहितकर साधन और कार्य कौनसे हैं, आदि सभी बातों को आयुर्वेद बताता है। यों कहना चाहिये कि यह ''जीवन का सम्पूर्ण विज्ञान '” है।

आयुर्वेद इतना प्राचीन है कि इतिहासज्ञ विद्वान इसके काल का निर्णय नहीं कर सकते हैं। वास्तव में जब जीवन का प्रारम्भ विश्व में हुआ, जब मनुष्य ने पहली बार प्रकाश देखा, उस समय से ही आयुर्वेद का प्रकाश भी उसने देखा।

इस समय आयुर्वेद की चार संहिंताएँ -चरक संहिता, सुश्रुत संहिता, काश्यप संहिता तथा अष्टांग हृदय उपलब्ध हैं। इनमें पहली तीन संहिंताएँ सहस्त्रों वर्ष पुरानी हैं। इसमें बहुत से औषध योग ऐसे उद्धृत.किये गये हैं जो उनसे भी

सहस्त्रों वर्ष पुराने हैं। ब्राह्मरसायन, च्यवनप्राशावलेह, फलघृत तथा पुनर्नवामण्डूर जैसे योग इसी प्रकार से हैं। इन संहिंताओं के अतिरिक्त पचासों अन्य ग्रन्थ भी उपलब्ध हैं। यह भी संस्कृत में लिखे गये हैं और अधिकांश पद्च में

लिखें हैं।

आयुर्वेद की एक शाखा रस शास्त्र है। यह शास्त्र पारद, खनिजों और धातुओं तथा वनौषधियों के संयोग से विकसित किया गया है। यह शास्त्र अद्भुत है, विज्ञान की इसमें पराकाष्टा है। सैकडों रस योग बनाये जाते हैं। चन्द्रोदय, मकरध्वज, अनेक प्रकार की भस्में तथा लक्ष्मीविलास रस आदि इसी की चमत्कारिक देन हैं।

सुदूर ग्रामों तक स्वास्थ्य और चिकित्सा सुविधा पहुँचाने का सबसे प्रमुख साधन आयुर्वेद ही है, क्योंकि बहुत बड़ी संख्या में ऐसी औषधियों हैं, जिनके द्रव्य प्राय: सर्वत्र मिलते हैं और साधारण पढे-लिखे लोग उनको

उपयोग में ले सकते हैं। आश्चर्य की बात है कि इस समय भी आयुर्वेद के ग्रन्थों में सहस्त्र से अधिक योग मिलते हैं। आधुनिक पाश्चात्य चिकित्सा पद्धति जिन रोगों की चिकित्सा में प्राय: सफ्ल नहीं होती जैसे संग्रहणी, प्रमेह, रक्तरोगों और वीर्य रोगों, आमवात, पक्षाघात तथा वात रोगों की चिकित्सा आयुर्वेदीय पद्धति से सफ्लतापूर्वक होती है। आधुनिक विकसित शल्य चिकित्सा में कठिन समझे जाने वाले अर्श, भगन्दर आदि जैसे रोगों की चिकित्सा आयुर्वेद द्वारा उत्तम रीति से होती है। वर्तमान में अनेक लोग प्रतिश्याय, ध्रास, कास आदि तथा उच्च रक्तचाप जैस्रे रोगों से ग्रसित रहते हैं, ऐसे विकार आयुर्वेद चिकित्सा से सिद्ध होते हैं। अनेक प्रकार के हृदय रोग भी आयुर्वेद से सिद्ध होते हैं।

आयुर्वेद एक सम्पूर्ण चिकित्सा पद्धति है।


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